Of Indian Media and Elections

Over the course of last few days, I came across two separate mentions regarding Indian media and the on-going elections. Both of them had a very disturbing underlying theme – which was – we cannot trust our media any more. We cannot rely on them to be unbiased, impartial and committed to the democratic processes.

Everything you read about the candidates, their utterances, their actions must be taken with a pinch of salt….for the truth may not be what it seems to be.

For the hardcore sceptics amongst you, this will hardly come as a surprise…What shook me though is the magnitude of the “problem”

.

In an article in WSJ, Paul Beckett wrote:

…Ajay Goyal is a serious, independent candidate contesting for a Lok Sabha seat in Chandigarh.
Never heard of him? Neither, probably, have a lot of people in Chandigarh because when it came to getting press coverage for his campaign he was faced with a simple message: If you want press, you have to pay.

…One broker offered three weeks of coverage in four newspapers for 10 lakh rupees ($20,000). A reporter and a photographer from a Chandigarh newspaper told him that for 1.5 lakh rupees ($3,000) for them and a further 3 lakh rupees ($6,000) for other reporters, they could guarantee coverage in up to five newspapers for two weeks.

…”It’s disappointing,” Mr. Goyal says. “What good is literacy and education if people have no access to real news, investigation, skepticism or a questioning reporter.”

…A free (in every sense) press is an integral part of a vibrant democracy. A corrupt press is both symptom and perpetrator of a rotten democracy.

How widespread is the practice of pay per say?

The best-known English-language dailies typically don’t do it so blatantly…Rather, those papers are more likely to hue closely to one major party or the other, making it tough for candidates who don’t fit the papers’ view of the world to be heard. But in the Hindi, Urdu and Gujarati media, to name a few, the practice is widespread, candidates say.

N. Gopalaswami, retired Chief Election Commissioner, says in an interview, “This is not something that can be ignored. It is not just a few apparent cases, it is much more than that.”

…In Mumbai, a city appropriately geared to commerce, politicians are faced with multiple payment options. Consider these phrases from newspaper editors and brokers, which I culled from campaigners:

“You want a front page photo for free? This is something people pay for.”

“If you want a picture in there or if you want a story, we have to be paid.”

“We’re going to publish the interview, but you need to buy 5,000 copies of our paper.”

“1.2 lakhs ($2,400) for the next two weeks and I will take care of all that coverage.”

If you think these were the thoughts of a prejudiced foreign journalist, think again.

From an internal email that detailed the experiences of a volunteer with one of the newer political formations, I garnered this bit of information:

…Media is against us and the amount of corruption in media is literally shocking!

When 10000 people voluntarily attended ….public meeting in … (after getting the message in radio and newspapers) which never happened in the last 30 years of India’s political history, all the news
papers gave very little importance to it and instead they highlighted the meetings of movie stars who gathered people by paying 200 to 700 rupees to each person.

You pay the money; they will write about you and show you in the TV. The rates are more or less fixed (e.g. 25 lakhs for assembly contestant for local edition coverage). All Telugu and English dailies are equally corrupted from local level to central level. This is in addition to their side taking according to their bosses’ own agendas.

A separate initiative to expose this is desperately needed. Media is the channel to expose truth to the people but if it is corrupted itself how can you expose it?

We are not alone though…as this US report from last year suggests:

Just 17% of voters nationwide (in the US) believe that most reporters try to offer unbiased coverage of election campaigns. A Rasmussen Reports national telephone survey found that four times as many—68%–believe most reporters try to help the candidate that they want to win.

Surprised?  Comments/thoughts welcome.

Thanks to borneverday for providing the inspiration for this post.

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BBC’s Objectivity Checklist Goes Right Through the Window (Courtesy, Hawkeye)

This is beyond funny…

“The great joke that is Indian Media” series: Part 1, Part 2, Part 3, Part 4, Part 5, Part 6, Part 7, Part 8 and Part 9 and Part 10

B Shantanu

Political Activist, Blogger, Advisor to start-ups, Seed investor. One time VC and ex-Diplomat. Failed mushroom farmer; ex Radio Jockey. Currently involved in Reclaiming India - One Step at a Time.

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14 Responses

  1. Ravi says:

    Shantanu,
    Though the blatantness is shocking this comes as no surprise for people who have to deal with media on every day basis. In Andhra Pradesh an ordibnary reporter from a daily was seen as so pwerful that collectors would stand up in greeting on getting a visiting card if they mentioned their publication.
    It is a open secret in many circles that reporters could walk into any office and threaten to expose the public servant if a reported amouint was not paid within said time.
    This is believe is the the saddest part of our democracy_ while the executive is plain corrupt and incompetent, the judiciary is overworked, the fourth estate is working like afifth coloumn completely abdicating even apretence of responsibility and transparence.

    Ravi

  2. Sachin says:

    Have a look at this below:

    ” चुनाव में मीडिया की बदलती भुमिका’

    सन् 2009 के आम चुनाव कई बातों के लिए याद रखें जायेंगे. ये शायद पहला मौका था जब चुनाव अभियान के दौरान राजनीती के शीर्ष पर बैठे नेताओं ने एक दूसरे के चरित्र पर कीचड़ उछलने में कोई कसर नहीं छोडी, स्तरहीन और भड़काऊ बयानों के मामले में नेताओं में एक दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ लगी रही और इसके बाद सत्ता की चासनी के लालच में धुर विरोधियों के स्तुतिगान के दृश्य भी दिखे , मगर ये चुनाव सिर्फ़ राजनीति की स्तर्हीनता के लिए ही याद रखें जायेंगे ऐसा नहीं है. ये चुनाव, देश के
    मीडिया की बदलती भूमिका का भी साक्षी रहा है. इस चुनाव में लोगों ने नेताओं के साथ साथ मीडिया का भी एक नया चेहरा देखा है. रोज़ रंग बदलती राजनीति के मोहरों को बदलते देखना तो इस देश के लोगों के लिए कोई नई बात नहीं है मगर राष्ट्रीय स्तर पर इस बार मीडिया का जो स्वरूप सामने आया उससे लोग हैरान है.

    हमारे सम्विधान ने मीडिया को लोक्तंत्र का चौथा स्तंभ माना है. सम्विधान निर्माताओं को ये यकीन था कि ये चौथा स्तंभ न्यायपालिका के साथ मिलकर विधायिका और कार्यपालिका की निगरानी कर लोक्तंत्र को और अधिक मज़बूट करेगा. आजादी के पहले और बाद कुछ अपवादों को छोड़कर प्रेस ने पूरी ईमानदारी के साथ अपनी भूमिका निभाई मगर इस चुनाव में लोगों के सामने मीडिया का एक ऐसा स्वरूप सामने आया जो जन की आवाज़ के अनदेखी कर धन की आवाज़ को गुंजा रहा था. ये शायद पहले चुनाव थे जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों में, अलग अलग पार्टियों से चुनाव लड़ रहे कई प्रत्याशियों ने मीडिया की दादागिरी और वसूली की शिकायतें भारतीय प्रेस परिषद और चुनाव आयोग को की.इन लोगों ने अपने क्षेत्र से निकलने वाले समाचार माध्यमो पर आरोप लगाया कि उनके प्रतिनिधियों या प्रबंधकों ने चुनाव के कवरेज के लिए उनसे एक मोटी राशि माँगी और ये रकम ना मिलने पर इन माध्यमों ने उनका बहिष्कार कर दिया जबकि पैसा देने वाले प्रत्याशियों के लिए इस तरह की खबरें दी गई मानो समाचार माध्यम उनके प्रवक्ता के रूप में कम कर रहे है.

    आगे बदने से पहले ऐसे कुछ मामलों पर नजर डालना मुनासिब होगा.

    1. यु. पी के घोसी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी राम इकबाल सींग ने यु.पी. से निकालने वाले एक बड़े अखबार के खिलाफ प्रेस काउन्सिल को लिखित शिकायत की. उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी विपक्षी उम्मीदवार से 20 लाख रु लेकर अखबार चुनाव की एकतरफा रिपोर्टिंग कर रहा है जिसमें उनका बहिष्कार कर दिया गया है. सिंह ने आपने पत्र में इस अखबार की कुछ कतरनें भी लगाई है. प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष को संबोधित पत्र में उन्होंने लिखा है कि इस अखबार द्वारा उनसे भी 10 लाख रु. माँगें गए थे.
    उनके निर्वाचन एजेंट ने आईएसआई आशय की एक शिकायत चुनाव आयोग को भी की है.

    2.समाजवादी जन परिषद, उत्तर प्रदेश ने भारत के चुनाव आयुक्त को एक पत्र लिखकर दो अखबारों की शिकायत की है। पत्र में कुछ अखबारों के प्रबंधन पर प्रत्याशियों से रुपये लेकर तस्वीरें-खबरें छापने का आरोप लगाया. इस पत्र में कहा गया है कि ये अखबार लोकसभा चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों से दस से बीस लाख रुपये लेकर उनके चित्र व खबरें विज्ञापन की बजाय खबर के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं।अखबारों द्वारा ऐसा करना जनता के विवेकपूर्ण तरीके से सूचना पाने के हक को प्रभावित कर रहा है तथा जो प्रत्याशी अखबारों को यह अवैध धन राशि नहीं दे रहे हैं, उनके विरुद्ध भी है।

    3. यु. पी से सपा के प्रत्याशी अरशद जमाल अन्सारी ने भी कुछ अखबारों के खिलाफ ऐसी ही शिकायत की.उनकी शिकायत पर मउ के जिला निर्वाचन अधिकारी ने वहा के जिला सूचना अधिकारी से इस मामले की जाँच करने को कहा.जांच के बाद भेजी
    रिपोर्ट में सूचना अधिकारी ने साफ-साफ लिखा है कि दो अखबार पैसे लेकर एक प्रत्याशी के पक्ष में खबरें प्रकाशित कर रहे हैं। ऐसी खबर को विज्ञापन की श्रेणी में माना जाना चाहिए और प्रत्याशी के व्यय विवरण में सम्मिलित किया जाना चाहिये।

    4. चंडीगढ़ से बसपा से प्रत्याशी और पूर्व केंद्रीय मंत्री हरमोहन धवन ने एक जनसभा में अखबारों द्वारा मांगे जा रहे पैकेज के मुद्दे को उठाया। रैली में उपस्थित हजारों की भीड़ को संबोधित करते हुए हरमोहन धवन ने कुछ अखबारों पर ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया।उन्होंने कहा कि कुछ अखबार उनसे खबर छापने के लिए लाखों रुपये मांग रहे हैं।

    5.धवन ने चंडीगढ़ में शनिवार को एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर कुछ मीडिया घरानों का पर्दाफाश किया। उन्होंने बताया कि तीन अखबारों के प्रतिनिधियों ने उनसे खबर छापने के लिए लाखों रुपये की मांग की थी। धवन ने तीनों अखबारों का नाम भी बताया।

    6. मध्यप्रदेश के एक तत्कालीन मंत्री ने भी कुछ समय पहले इसी आशय का आरोप लगाया था.

    देश के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग राज्नीतीक दलों के नेता अगर चुनाव के दौरान मीडिया की भूमिका पर अंगुली उठा रहे हो तो ये बात सोचने पर मजबुर करती है कि आख़िर इसके पीछे कारण क्या है.? ज्यादातर नेताओं के भ्रष्ट आचरण और चरित्र तथा मीडिया के प्रति विश्वास के चलते मन में पहला सवाल तो यही उठता है कि कहीं मीडिया का विरोध अपने खिलाफ छपी “सच्ची” खबरों की खुन्नस निकालने के लिए तो नहीं हो रहा है ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि चुनाव के दौरान पोल खुलने के कारण खिसियाइ हुई जमात मीडिया का खंभा नौच रही है ? लेकिन ऐसा होता तो मीडिया पर प्रहार कराने वाले ज्यादातर लोग किसी एक ही दल या एक ही राज्य के होते और उनकी शिकायत किसी एक पत्र या समूह के खिलाफ होती मगर ये किस्सा किसी एक राज्य का या किसी एक अखबार का नहीं है. कमोबेश पूरे देश ने इस चुनाव में देखा की स्थानीय से लेकर प्रंत्तेय और प्रांतीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के मीडिया प्रतिष्ठान सिक्के से चलने वाले सार्वजनिक फोन की तरह काम कर रहे थे जिसमें सिर्फ़ सिक्का डालने वाले व्यक्ति की आवाज़ ही तक पहुँचती है. जिन उम्मेदवारो ने इस यंत्र में सिक्का नहीं डाला उनकी आवाज़ दबा डीगयी चाहे वो कितनी मज़बूत क्यों ना हो.

    ऐसा नहीं है कि इस नयी व्यवस्था ने सिर्फ़ इन्ही 4 या 5 लोगों को अपना शिकार बनाया हो. ये वो लोग है जो इस धंतंत्र के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत कर सके. दरअसल चुनाव अब मीडिया के लिए रेवेन्यू जनरेशन का सबसे बड़ा पर्व बन चुका है चुनाव के पहले ही सभी छोटे-बड़े मीडिया हाउसों ने लोकसभा चुनाव कवर करने के लिए रणनीति बना ली थी। सबका लक्ष्य एक ही था – चाहे जैसे भी हो बस ज्यादा से ज्यादा पैसा उगाहो। । चुनाव आयोग ने चुनाव खर्च को लेकर जो बंदिशें प्रत्याशियों पर लगाई थी , उसका तोड़ प्रत्याशियों व मीडिया प्रबंधकों ने मिलकर निकाल लिया है। अखबारों में अब प्रत्याशियों का विज्ञापन नहीं छपता क्योंकि इस विज्ञापन का खर्च प्रत्याशी के चुनाव खर्च में जोड़ दिया जाता है। विज्ञापन खर्च से बचने के लिए इन लोगों ने जो मायाजाल रचा है उसने खबरों और विज्ञापनों का फर्क खत्म कर दिया, चुनाव आयोग को अँगूठा दिखा दिया और चुनाव को पूँजीपतियों का खेल बना दिया और यही बात सबसे ज्यादा चिंताजनक है.

    इस बार प्रत्याशियो ने मीडिया हाउसों को मोटी रकम देकर विज्ञापन की जगह अखबारों के चुनाव पेज पर आपने पक्ष में खबरें छपवाई गई अपनी रैलियों में जगह-जगह भीड़ उमड़ने की बात लिखवायी गय ी. विरोधी उम्मीदवारों की खबरों को या तो अखबारों से गायब करवा दिया या फिर उनके खिलाफ खबरें छपवायी गयी. अखबारों ने पैसे देने वाले प्रत्याशियों के भाषण को जनसभा की तस्वीर के साथ छापा जबकि जिस प्रत्याशी ने पैकेज नहीं दिया उसकी प्रति के बड़े नेता को भी नजरअंदाज कर दिया गया. जो प्रत्याशी लाखों रुपये नहीं खर्च कर पाये , उनमें चाहे लाख योग्यता हों, मगर या तो उन्हें उपेक्षित किया गया या उनकी बघिया उधेडी गयी. चैनलों पर भी ऐसा ही कुछ नजारा था. अब लगभग हर राज्य में एक से ज्यादा रीजनल चैनल हो गए है, हर शहर में कम से कम 2 लोकल चैनलल्स अलग से है. कहीं कहीं तो लोकल चैनल 3 या इससे ज्यादा भी है.लगभग हर चैनल इस मामले में आपने प्रतिद्वंदियो को पीछे छोड़ने की कोशिश में नजर आया.

    चुनाव के दौरान अखबार पड़ने या चैनल्स देखने वाले ज्यादातर लोग परदे के पीछे चल रहे इस खेल से अनजान रहते है. लोग ये मानकर चलते है कि अखबार में जो ख़बर छपी है उसके पीछे पत्रकार की पैनी निगाह और निष्पक्ष आकलन होगा. यही सोचकर पाठक या दर्शक ख़बर को देखता या पड़ता है और फिर उसके आधार पर अपना मानस बनाता है. चुनाव के समय स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों के साथ, प्रत्याशियों की योंग्यता,उनका व्यक्तित्व, उनकी उपलब्धिया, उनका चरित्र, उनका व्यव्हार, स्थानीय मुद्दों की समझ और समस्याये सुलझाने का माद्दा ये सारी बातें मतडेटा के निर्णय को प्रभावित करती है. उसे इनमें से कई जानकारिया मीडिया से ही मिलती है, मगर यदि खबरें पैसों के आधार पर लिखी गई है तो जाहिर है कि ज्यादा पैसे देने वाले प्रत्याशी को ज्यादा योग्य और बेहतर उम्मीदवार बनाकर पेश किया गया होगा फिर चाहे वो शहाबुद्दीन, पप्पु यादव्, मुख्तार अंसारी या राजा भैया ही क्यों ना हो.

    चुनाव से के सम्बन्धित रिपोर्टिंग के लिए प्रेस परिषद के दिशा – निर्देश

    1. प्रेस का यह कर्तव्य होगा कि चुनाव तथा प्रत्याशियों के बारे में निष्पक्ष रिपोर्ट दे । समाचारपत्रों से अस्वस्थ्य चुनाव अभियानों में शामिल होने की आशा नहीं की जाती । चुनावों के दौरान किसी प्रत्याशी , दल या घटना के बारे में अतिशियोक्तिपूर्ण रिपोर्ट न दी जाए । वस्तुत: पूरे मुकाबले के दो या तीन प्रत्याशी ही मीडिया का सारा ध्यान आकर्षित करते हैं । वास्तविक अभियान की रिपोर्टिंग देते समय समाचारपत्र को किसी प्रत्याशी द्वारा उठाये गये किसी महत्वपूर्ण मुद्दे को छोड़ना नहीं चाहिए और न ही उसके विरोधी पर कोई प्रहार करना चाहिए ।
    2. निर्वाचन नियमावली के अन्तर्गत सांप्रदायिक अथवा जातीय आधार पर चुनाव अभियान की अनुमति नहीं है । अत: प्रेस को ऐसी रिपोर्टों से दूर रहना चाहिए जिनसे धर्म, जाति , मत , सम्प्रदाय अथवा भाषा के आधार पर लोगों के बीच शत्रुता अथवा घृणा की भावनाएं पैदा हो सकती हों ।
    3. प्रेस को किसी प्रत्याशी के चरित्र या आचरण के बारे में या उसके नामांकन के संबंध में अथवा किसी प्रत्याशी का नाम अथवा उसका नामांकन वापस लिये जाने के बारे में ऐसे झूटे या आलोचनात्मक वक्तव्य छापने से बचना चाहिए जिससे चुनाव में उस प्रत्याशी की संभावनाएं दुष्प्रभावित होती हों । प्रेस किसी भी प्रत्याशी/दल के विरुद्ध अपुष्ट आरोप प्रकाशित नहीं करेगा ।
    4. प्रेस किसी प्रत्याशी/दल की छवि प्रस्तुत करने के लिए किसी प्रकार का प्रलोभन – वित्तीय या अन्य स्वीकार नहीं करेगा । वह किसी भी प्रत्याशी/दल द्वारा उन्हें पेश किया गया आतिथ्य या अन्य सुविधायें स्वीकार नहीं करेगा ।
    5. प्रेस किसी प्रत्याशी/दल – विशेष के प्रचार में शामिल होने की आशा नहीं की जाती । यदि वह करता है तो वह अन्य प्रत्याशी/दल को उत्तर का अधिकार देगा ।
    6. प्रेस किसी दल/ सत्तासीन सरकार की उपलब्धियों के बारे में सरकारी खर्चे पर कोई विज्ञापन स्���ीकार / प्रकाशित नहीं करेगा ।
    7. प्रेस निर्वाचन आयोग/निर्वाचन अधिकारियों अथवा मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा समय समय पर जारी सभी निर्देशों/अनुदेशों का पालन करेगा ।
    8. जब भी समाचारपत्र मतदान पूर्व सर्वेक्षण प्रकाशित करते हैं तो उन्हें सर्वेक्षण करवाने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं का उल्लेख सावधानीपूर्वक करना चाहिए एव्म प्रकाशित होने वाली उपलब्धियों के नमूने का माप एवं उसकी प्रकृति , पद्धति में गलतियों के संभावित प्रतिशत का भी ध्यान रखना चाहिए । [ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मतदान पूर्व सर्वेक्षणों पर रोक लगा दी गयी है ।-सं. ]
    9. अगर चुनाव अलग चरणों में हो तो किसी भी समाचारपत्र को मतदान पूर्व सर्वेक्षण चाहे वे सही भी क्यों न हो प्रकाशित नहीं करना चाहिए ।

  3. B Shantanu says:

    While on Media and Corruption…here is a 6-year old column from Sucheta Dalal Selling news or buying silence

  4. B Shantanu says:

    Excerpts from The medium, message and the money by P. Sainath

    C. Ram Pandit can now resume his weekly column. Dr. Pandit (name changed) had long been writing for a well-known Indian language newspaper in Maharashtra. On the last day for the withdrawal of nominations to the recent State Assembly elections, he found himself sidelined. An editor at the paper apologised to him saying: “Panditji, your columns will resume after October 13. Till then, every page in this paper is sold.” The editor, himself an honest man, was simply speaking the truth.

    …The Assembly elections saw the culture of “coverage packages” explode across the State. In many cases, a candidate just had to pay for almost any coverage at all. Issues didn’t come into it. No money, no news…The Hindu reported on this (April 7, 2009) during the Lok Sabha elections, where sections of the media were offering low-end “coverage packages” for Rs.15 lakh to Rs.20 lakh. “High-end” ones cost a lot more. The State polls saw this go much further.

    None of this, as some editors point out, is new. However, the scale is new and stunning. The brazenness of it (both ways) quite alarming.

    …At the top end of the spectrum, “special supplements” cost a bomb. One put out by one of the State’s most important politicians — celebrating his “era” — cost an estimated Rs.1.5 crore. That is, just this single media insertion cost 15 times what he is totally allowed to spend as a candidate. He has won more than the election, by the way.

    One common low-end package: Your profile and “four news items of your choice” to be carried for between Rs.4 lakh or more depending on which page you seek. There is something chilling about those words “news items of your choice.” Here is news on order. Paid for. (Throw in a little extra and a writer from the paper will help you draft your material.) It also lent a curious appearance to some newspaper pages. For instance, you could find several “news items” of exactly the same size in the same newspaper on the same day, saying very different things. Because they were really paid-for propaganda or disguised advertisements. A typical size was four columns by ten centimetres. When a pro-saffron alliance paper carries “news items” of this size extolling the Congress-NCP, you know strange things are happening. (And, oh yes, if you bought “four news items of your choice” many times, a fifth one might be thrown in gratis.)…

  5. B Shantanu says:

    Another depressing article: ‘Cash for coverage’ comes to BBMP elections too:

    Corporator-aspirants are leaving no stone unturned, as they openly offer money to the media to be written about. Paid news goes local.

    Vaishnavi Vittal , 24 Mar 2010

  6. Malavika says:

    Interesting article. I have noticed that the old lady of Bori Bander has become P*r? lady of Bor Bander.

    “I stumbled into a discussion on obscenity in Indian media. Reading divergent positions on the issue, I found that the harshest barbs by some participants were directed at the Times of India for practising what they called soft-porn journalism.”

    http://www.guardian.co.uk/commentisfree/2010/oct/10/times-india-sex

  7. B Shantanu says:

    Adding this here for the record. Excerpts from And the pay-to-print saga resumes by P Sainath:
    …The former Maharashtra Chief Minister had challenged the power of the Election Commission of India (ECI) to go into the truth or falsity of his 2009 poll expenses. Those proceedings in the ECI had gained infamy as the ‘paid news’ case. A case which embarrassed major newspapers that had run scores of hagiographic full pages of ‘ news’ on Mr. Chavan during his poll campaign. Pages without a single advertisement on them (The Hindu, November 30, 2009). And without so much as a mention of his rival in Bhokar constituency in Nanded.


    It’s a double whammy. Not long before this judgment, the Central Information Commission (CIC) had ordered the Press Council of India (PCI) to unwrap its own ticking parcel. That is: the PCI’s ‘paid news’ report which it had suppressed under pressure from media bosses. …
    Now the CIC, acting on Mr. Moudgil’s complaint, has told the Press Council to put the full report up on its website by October 10.

    Together, these two developments promise many blushes for Big Media.

    Mr. Chavan’s accounts are a delight. A kind of Gandhian manual on poll austerity. Read them and you know that Bhokar, Nanded is where you want to settle post-retirement. Things are so cheap. Mr. Chavan wrapped up his newspaper advertising within a frugal Rs.5,379. His entire poll campaign cost less than Rs.7 lakh. (The limit for an assembly constituency in Maharashtra that year was Rs.10 lakh). This included two public meetings where he brought down Bollywood megastar Salman Khan as the main attraction, drawing thousands of people. The first meeting cost a piffling Rs.4,440 and the second even less, only Rs.4,300. In both cases the main cost, more than a third of the total, was on the public address system. (But even Steve Jobs could not have got the audio done in Rs.1,500). The pandal top cost just Rs.200, hired sofas cost the same and Mr. Chavan spent no more than Rs.1,000 on setting up the stage. (See: The Hindu, November 10, 2010).

    Four dailies, asked by the ECI whether what had appeared on Mr. Chavan was news or paid-for, scorned all notions of paid news.
    ..Their letters to the ECI are clear and edifying.
    ..Two Marathi papers pleaded proximity to the Congress. As the daily Pudhari argued in a five-page letter: “….every newspaper has its inclination towards a political party and Pudhari is no exception to that.”
    ..Lokmat candidly shared its aim in bringing out so many pages on Mr. Chavan. This was “to acquaint the people of Maharashtra about the achievements and developments of the Congress-led government in Maharashtra during its tenure under the present Chief Minister.” (Who had held that post for all of 11 months at the time). “The other factor that motivated us…is the alignment of our group’s ideology with that of the Congress Party.”
    …The Times Group (for Maharashtra Times) also trashed any notion of ‘paid news.’ We are “a balanced and responsible corporate,” their letter asserted…

  8. B Shantanu says:

    Here is the link to the full “Paid News” report, which was initially suppressed by the Press Council of India: http://presscouncil.nic.in/Sub-CommitteeReport.pdf
    Names specific media houses. Makes for depressing reading.

  9. B Shantanu says:

    Truly historic decision: ‘Paid news’ claims first political scalp as EC disqualifies MLA.
    And note that this is as much about excessive election expenditure as it is about “paid news”.
    Hope that the EC shows the same determination in the cases of former CMs of Maharashtra and Jharkhand that are due to be heard over the next few days

  10. B Shantanu says:

    From Yes, we paid for news: candidates plead guilty on 201 of 339 notices, a short excerpt:
    As many as 523 cases where candidates are alleged to have paid to get news published or broadcast in the run-up to the Punjab elections, held on January 30, have now come to the fore.

    And of the 339 cases for which notices were issued by the Election Commission, a staggering 201 cases have seen the candidates acknowledging that they paid for news. They have now agreed to book these payments onto their expenditure accounts. Each candidate’s account has a cap of Rs 16 lakh.
    …In many of the instances where candidates have denied the charges, the expenditure has been booked in the “shadow expenditure registers” being maintained by the EC’s accounting teams.

  11. B Shantanu says:

    For the record…Excerpts from the The Cost Of Democracy

    It’s getting bigger by the day. If the sheer number of notices sent by the Election Commission to candidates and media houses is any indication, paid news is big news in the assembly elections in Punjab. By the time polling came to a close on January 30, the commission’s media monitoring committees (MMCs) in the districts had issued some 300 notices. More than 200 of those served notices have even admitted to paying or accepting payment, the candidates among them agreeing to show this spending in the Rs 16 lakh they are permitted to spend on canvassing.

    It seems everyone does it, and most quite freely admit it too. Notices were issued to candidates after MMCs set up in each district tracked election-related coverage of candidates. The broad criteria adopted to identify paid news were: consistent coverage of a candidate in a particular newspaper; similar wording in the coverage of a candidate appearing in different newspapers; or the appearance of more than one news item about a candidate on a page. One committee at the state level scanned election coverage by TV news channels and clamped down on “suspect” programmes.

    Many a media house based in Punjab has been rattled by the Election Commission’s first-time effort to curb paid news. Nevertheless, media watchers say what has been exposed is just the tip of the iceberg. “The flip side of the EC’s strictness in accounting for advertisements put out by candidates is that now there are very few candidates’ ads in newspapers or on TV channels,” says Kanwar Sandhu, managing editor of Day & Night News, a TV channel. “Instead, candidates either pay local correspondents or get paid news inserted.”

  12. B Shantanu says:

    From Election Commission: 198 confirmed cases of Paid News, more detected, 17 April 2014:
    …Election Commission has issued more than 350 show cause notices to various candidates in the fray in the paid news cases.

    The EC has also seized more than Rs 216 crores in cash and above one crore litres of liquor across the country till date.

    “We have served 368 notices in paid news cases till date,” Akshay Raut, Director General of Election Commission, said here today.

    He said out of total 368 notices, 198 were confirmed cases of paid news.

    Raut said Maharashtra leads the paid news cases with 66 show cause notices being served to the candidates, of these, four were confirmed after inquiry.

    There were nine cases of paid news in Delhi, 60 in Uttar Pradesh and 41 in Haryana.

  1. May 12, 2009

    […] plays to its prejudices. BS Shantanu writes on how we must take anything the media says with a pinch of salt. WSJ’s story on how smaller news outfits will accept money to promote candidates was […]